घुमने की आदत

अपने गाव में मै पहला बच्चा था जो की इंग्लिश स्कूल में जाता था।लोग मुझे रास्ते में जाते हुए बहुत घूर के देखा करते थे।स्कूल तो बस कहने की थी,मै कभी २-३ महीने में १ या २ दिन के लिए जाया करता था।बाकी दिन मै दिलदार नगर की सैर करता था।

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  1. आज से ९ साल पहले की बात है जब मै क्रिसेंट कान्वेंट,दिलदार नगर  में पढ़ा करता था।मेरी उम्र १० साल रही होगी  जब मेरे अब्बू ने मुझे जबरदस्ती मेरा नाम उस स्कूल में लिखवाया था।मै पढने में बहुत कमज़ोर था इतना की मेरी रैंक हमेसा निचे आती थी अर्थात निचे से 1 रैंक आती थी।घुमने का बहुत बड़ा सौख था।

    १२ जून,साल २००४ -------
    सुबह का समय मै बिस्तर से उठा,स्नान  कर के मै खाना खाया।स्कूल के कपडे(सफ़ेद कपडा,लाल पैंट,टाई ) पहना और अपनी साइकिल उठाई और नहर के रास्ते से चल दिया।अपने गाव में मै पहला बच्चा था जो की इंग्लिश स्कूल में जाता था।लोग मुझे रास्ते में जाते हुए बहुत घूर के देखा  करते थे।स्कूल तो बस कहने की थी,मै कभी २-३ महीने में १ या २ दिन के लिए जाया करता था।बाकी दिन मै दिलदार नगर की सैर करता था।
    हमेसा की तरह मै उस मोड़ पे पंहुचा जहा से २ रास्ते जाते थे,एक स्कूल की तरफ और दूसरा दिलदार नगर बाज़ार की तरफ।मै कुछ देर रूका और सोचने लग गया की कहा जाऊ। दिलदार नगर इतना खूबसूरत था की मुझे दुसरे रास्ते पर जाने  के लिए मजबूर कर देता।
    फिर मैंने अपनी साइकिल घुमाई और खुसी से झूमता हुआ आगे बढ़ने लगा।जाते हुए मै दूकान पे लगी पोस्टरों को देखता रहा।
    फिर मेरी नज़र एक और पोस्टर पे पड़ी जो की कमसार हाल की एक पिक्चर की थी।उस पिक्चर का नाम ''कोई मिल गया''  था ।उस समय मै बहुत पिक्चर देखा करता था।
    बस ये सब देखना था की मेरी साइकिल कमसार हाल की तरफ चल पड़ी ।जब कमसार हाल में पहुचा तो देखा की बहुत भीड़ है मुझे डर लगने लगा की कोई देख न ले।मै अपना मुह छुपाते हुए साइकिल स्टैंड पर पहुचा ।वहा पहुच के मैंने वहा पर एक लड़के को १ रूपये दिए और अपनी साइकिल को साइकिल स्टैंड पर खड़ा किया।फिर कैसे भी मै छिपते हुए १२ रूपये का एक  हॉल टिकेट लिया ।उस समय हॉल टिकेट का दाम १२ निचे वाला,१३ बिच वाला और १५ रूपये ऊपर वाला था ।
    १० मिनट बाद जब हॉल का प्रवेस गेट खुला तो लोग बहुत तेज़ी से अन्दर की तरफ दौड़ने लगे मै भी उसी भीड़ से निकल कर उंदर जा के एक शीट लिया और दोनों हाथ को अपने मुह पर इस तरह रख लिया की कोई देख न ले।पिक्चर सुरु हुई  और १:३० घंटे चली फिर इंटरवल हुई ।पापड़ वाले से मैंने १० पापड़ लिया और इंटरवल के बाद की सिन देखने लगा।पिक्चर ख़तम होने के बाद मैंने अपने साइकिल को उठाया और दिलदार नगर बाईपास रोड पर जाने लगा।कुछ देर में मै भकसी-मिर्चा के बिच में पहुचा।वहा एक नहर था और उसके ऊपर एक बैठने का था मैंने वहा पर २० मिनट गुजारे।स्कूल छुटने का टाइम ३:०० बजे था।इसीलिए  मै ३ बजे से पहले घर नहीं जा सकता था।और अभी तक सिर्फ २:०० ही बजे थे।
    फिर मै वहा से उठा और साइकिल से रेलवे लाइन पार की और धीरे धीरे  चलाते हुए मै फुल्ली-भकसी बड़ी नहर पर पहुचा।नहर में पानी भरी हुई थी।मैंने सोचा की दस मिनट नहा लेते है।मै वहा पर ५ मिनट ही नहा पाया ।२:३५ बज चुके थे कैसे भी मुझे २५ मिनट और काटने थे।धुप बहुत तेज़ हो चुकी थी इसीलिए अब मुझ से रहा नहीं गया और  मै दिलदार नगर की तरफ चल पड़ा ।रास्ते में जा ही रहा था की कालू की नज़र मुझ पर पड़ी।उसने भोजपुरी वर्ड में मुझ से बोला ''चल चल तोर अम्मा से बतावत बाटी एधिर घूमत बाटे स्कूल ना गईले ह''।मै एक दम से डर गया।डर के मरे मेरे धड़कन धक् धक् करने लगा। कैसे भी हिम्मत कर के मै घर पहुचा।फिर अम्मी ने पूछा ''कहा गईल रहले रे चोरवा''(अम्मी मुझे गुस्से में चोरवा बुलाया करती थी क्युकी मै अम्मी के २०-५० रूपये चुरा लिया करता था।) मैंने बोला ''स्कूल गईल रहली और कहा जाईब''।अम्मी ने बोला झूट बोल्बे अब्बे तोर हम खुमारी चोडावत बाटी''।फिर अम्मी ने  बॉस की पतली छड़ी ली और मेरी पीठ लाला कर दी।
    ४:०० मै चुपके से खाना खाया और बहार घुमने  जाने लगा तभी अब्बू आ गये।उन्होंने गुस्से में अपनी साइकिल खड़ी की और मेरी उसी छड़ी से फिर से पिटाई की ।रोते हुए मै घर में गया।अब्बू खाना खा कर खटिया पर लेट गये मै उनकी और अम्मी की नज़र से बचते हुए बहार निकल गया।८:०० रात को मै घूम कर घर आया तो अब्बू ने मेरी फिर से पिटाई की और और बोला की आज तू रात भर पढ़ेगा नहीं तो खाना नहीं मिलेगा।
    मै रात भर किताब खोलकर सिर्फ ताकता रहा।लगभग १२:०० बजे होगे तभी अम्मी आई और मुझे खाना खिलाया फिर जा कर मै सो गया।

    अगले सुबह फिर से कुछ इसी ही कहानी हुई ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
    written by मोहम्मद अज़ीज़
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